मेरे गुरू

 

मेरे गुरू , मेरे मुरशिद !

  • गुलशन द्याल

 आज की मेरी कहानी एक इंसाफ़ पसंद आदमी की कहानी है। इंसाफ़ को प्यार करने वाले लोग बहुत कम होते हैं। अगरचे ये भी एक सच्च है हम कुछ बातों के संस्कार जन्म से ही लेकर पैदा होते हूँ  परन्तु  मेरे ख़्याल में इंसाफ़ पसंद आदमी की आमद हमेशा एक दम नहीं होती।  उम्रें  गुज़र जातें हैं, रोज़ की ज़िंदगी के कड़वी, सच्चे, तल्ख़, तजुर्बों में से इंसान गुज़रता है – ज़िंदगी के हर रंग, हर ढंग और हर र॒ख़ को वो पढ़ता है, ज़िंदगी को इस की इंसाफ़ियों और ना इंसाफ़ियों के साथ जानता है ; उन के दर्द सहता है। ना इंसाफ़ियों के साथ ज़िंदगी का जो  हुस्न करूप  होता है, या ज़िंदगी जब इंसाफ़ के बगै़र मरती है तो – इस सब को जान कर ही वह  समझता है कि इंसानी इतिहास में इंसाफ़ कितना क़ीमती है। अगर आप ज़िंदगी को प्यार करते हैं और आप चाहते हैं कि दुनिया में सभी लोग अमन और चैन  की ज़िंदगी बसर करें तो आपके अंदर इंसाफ़ की ख़ाहिश इच्छा  पैदा होनी ज़रूरी है अगर आप  एक बार इंसाफ़ के सच्च को जान जाते हैं , पहचान जाते हैं तो फिर इंसाफ़ के साथ जीना ज़रूरी हो जाता है। फिर आप इंसाफ़ के रास्ते से हट नहीं सकते। किया है ये इंसाफ़ ? मेरी नजर से  सच्चाई का दूसरा नाम इंसाफ़है। सच्च को आप डीफ़ाईन कर के लफ़्ज़ों में क़ैद कर सकते हैं लेकिन परन्तु  इंसाफ़ को आप को जीना पड़ता है। इंसाफ़ जीयी जाती सच्चाई है । एक बार इंसाफ़ का स्वाद पड़ जाय तो फिर यही आप का अक़ीदा बन जाता है, आप का मज़हब और आप का इशक़ भी यही होता है। अब इंसाफ़ के बगै़र जीवन का कोई चारा नहीं, कोई गुज़ारा नहीं।

मेरे सुफनेगर  के हीरो कुछ इस तरह के ही हैं, मेरे गुरु और मेरे मुर्शिद ! जिस तरह में अपने गुरु को जानती हूँ इसी तरह उन के बारे में ब्यान करना मेरे क़लम से बाहर है – लेकिन परन्तु  उन के साथ रह रह कर एक तस्वीर जो मेरे ज़हिन  में उभरती है और जिस की आज की दुनिया के समाज को ज़रूरत है ; वह  यही है: इंसाफ़ पसंद हो, दूर अंदेश हो – सभी हदों से ऊपर उठ कर सोच सके ; तंगदिली ,ज़ात पात, नसल, रंग – रूप, मज़हब की तमाम क़ैदों से आज़ाद होकर खुले आसमान में उड़ सके – ये सारी दुनिया उसे अपनी लगे – अलग अलग फ़िज़ाओं में वह  सांस ले सके  – अलग अलग फ़लसफ़ों को वह  समझ सके और अपने से अलग सोच रखने वालों का एहतिराम सत्कार कर सके और उन की जगह ख़ुद को खड़ा करके मुख़ालिफ़ विरोधी सोच को भी जान सके नई समतों ( दिशायों) की खोज लगा सके और पुराने रास्तों और रिवायतों से हट कर अपना नया रास्ता बनाए और ऐसी दुनिया बनाए जिस में सभी बगैर  किसी नफ़रत और फ़र्क़ के अपनी मर्ज़ीके साथ अपनी ज़िंदगी जी सकें । और यही सही ज़िंदगी है और ज़िंदगी की इस तरह की ही शक्ल मैंने अपने गुरु में पाई है और यह  जाना है कि इस तरह के इंसान,  मनुष्य इस धरती पर पैदा होते हैं।
बहुत प्यार है मुझे उन के साथ ! और इस प्यार को क़लम के साथ लफ़्ज़ों में ब्यान करना और क़ैद करना मुश्किल है। कैसे बात करूं मैं ? नामुमकिन है। जो ख़ास मर्द मेरी ज़िंदगी में एहमीयत रखते हैं, वो बहुत कम हैं, सच्च तो ये है कि इन की एहमीयत मेरे डैडी के बाद पहले नंबर पर है। मेरी ख़ुशक़िसमती कि एक दिन में जब उन को पाश के पिता जी से मिलाने के लिए उन के घर लेकर गई तो उन्हों ने बड़े मोह और प्यार के साथ पिता जी को कहा, ” गुलू  मेरी शागिर्द ही नहीं ; उस को मैं बेहद प्यार भी करता हूँ। ” प्यार करना एक सुंदर एहसास है और किसी का प्यार हासिल करना इस से भी ज़्यादा है । अब तक आप समझ ही गए होंगे कि यह  लाजवाब आदमी कौन है मेरी ज़िंदगी में?
सय्यद आसिफ़ शाहकार ! – जैसे कि हर शागिर्द का मसला होता है वैसे ही मेरा भी मसला है कि मैं चाहे लाख कोशिश कर लूं – फिर भी उन के बारे में कुछ कहना मेरे बस की बात नहीं ! मैंने बहुत कोशिश की कि बुलहे शाह, सुलतान बाहु और दूसरे की काफ़ियों से कुछ लफ़्ज़ चुरा कर अपने मुर्शिद के बारे बताऊं – जो मेरी ज़िंदगी में इतनी एहमीयत रखते हैं लेकिन परन्तु  फिर मेरा प्यार तो मेरा प्यार है – इस लिए अपने ही लफ़्ज़ ठीक हैं, चाहे वह  कैसे भी हों  ! गुरु और शागिर्द का अपना ही एक अन्न कहा रिश्ता होता है ; जिस को लफ़्ज़ों में क़ैद करना मुश्किल होता है – मेरी ज़िंदगी की रौनक हैं वोह । अब तक मैंने जिन लोगों के बारे में लिखा है मैं तब ही लिख सकी हूँ क्योंकि मेरा कोई ना कोई हिस्सा इन सब के साथ प्यार और एहतिराम का था तब ही तो लिखना मुम्किन हो सका।
दो साल पहले जब मेरी दोस्ती उन के साथ हुई तो उन्हों ने बताया कि सय्यद मुस्लमानों की एक ऊंची ज़ात गिनी  जाती है ; वैसे ही जैसे हिन्दू में ब्राह्मण ! पता नहीं उन्हों ने मुझे यह  बात क्यों बताई क्योंकि ना तो वह  ज़ातों , नसलों और मज़हबों में यक़ीन रखते हैं और ना ही किसी फ़िर्कापरस्ती में। मेरे और उन के दरमयान रब की तरफ़ से क॒छ इत्तिफ़ाक़ी रिश्ते भी हैं। एक तो यह  कि इन का और मेरी मम्मी का जन्म दिन एक ही दिन का है – सात सितंबर ! दूसरा कारण भी बड़ा दिलचस्प है – जिस महफ़िल में में इन को पहली बार मिली थी – वहां में जाना नहीं थी चाहती लेकिन  मेरे डैडी ने वहां मुझे ज़बरदस्ती भेज दिया ! और फिर में जब पाकिस्तान गई तो वोह  मुझे ख़ास ख़ास जगहें दिखाने के इलावा अपने गांव भी ले गए। आसिफ़ जी का गांव है चक नंबर दो और उसे कहते हैं चक सय्यदां वाला । और इस से उगला और बिलकुल साथ वाला गांव है चक नंबर तीन और जिस को कहते हैं – चक दयालां वाला। जी हाँ इस गांव में तमाम लोग मेरी ही गौत के हैं। जब आप किसी को प्यार करते हैं तो आप इस तरह ज़बरदस्ती रास्ते मिला लेते हो ; और या कुछ इश्वर की तरफ़ से मिल जाते हैं।
इन के सय्यद होने का एक ख़ास असर है उन के इलाक़े में। दयालों  के जो बुज़ुर्ग थे, इन सभी के चेहरों पर आसिफ़ जी के लिए अक़ीदत साफ़ नज़र आ रही थी । अगरचे उन्हों ने मज़ाक़ में यह  भी कहा कि इन सय्यदों पीरों  के सदक़े वह  अच्छे भले सिखों  से मुस्लमान बन गए थे। आसिफ़ जी का मतलब है, वोह  जो माफ़ कर सके । और अगर आप आसिफ़ जी की आब-ओ-हवा में कभी रहे हूँ तो आप जान जाऐंगे कि इन के सीने में एक बहुत ही दयालू और नाज़ुक दिल है। शाहकार – उस लफ़्ज़ को आप सब समझते हैं – मेरे मुर्शिद सच्च मुच ही एक शाहकार  इंसान हैं। जिस तरह उन के कहने मुताबिक़ वो सिखों  के साथ पागलों की तरह प्यार करते हैं इसी तरह ही पागलों की तरह मैं  भी उन के साथ प्यार करती हूँ। शायद इस से भी ज़्यादा । लेकिन एक राज़ की बात बताऊं मेरी और उन की लड़ाई भी बहुत होती है जब हम एक दूसरे के साथ किसी बात पर रज़ामंद नहीं होते। तकरार ख़ूब होती है लेकिन आख़िर में हम हमेशा एक दूसरे के साथ रज़ामंद हो कर ही बात को ख़तम  करते हैं । कभी भी किसी बहस  को बे इत्तिफ़ाक़ी के साथ ख़तम  नहीं किया ।
यह  भी एक इत्तिफ़ाक़ है कि सोहन सिंह संधू की कहानी चलती चलती बंगाली बोली की मुहिम में रलगड हो गई, और ये भी एक इत्तिफ़ाक़ है कि बंगाल की बात आसिफ़ जी की ज़िंदगी के साथ जा जुड़ी। और ये बात आसिफ़ जी की ज़िंदगी के साथ इतनी जुड़ी हुई है कि मैं इन की बात किए बगै़र बंगाल की बात को आगे चला ही नहीं सकती।
दो साल पहले मुझे उन्हों ने बातों बातों में ही बताया कि एक बार उन्हों ने जेल भी काटी है। उस  वक़्त मैंने उन की बात को सुनी उन्सुनी  कर दिया लेकिन परन्तु  फिर बंगाल की लहर पर लिखते लिखते गर्मियां की छुट्टियां में मैंने उन से ये बात दुबारा पूछी।
उन्हों ने यह  बात इस तरह शुरू की  जब 1965 की जंग हुई तो पाकिस्तान की सरकार ने आम लोगों को यह  यक़ीन दिलवा दिया कि यह  जंग उन्हों ने जीती है लेकिन  फिर रूस ने बीच में पड़ कर दोनों देशों के दर्मिआन  ताशकंध में समझौता करवा दिया। इस सुलहनामे के मुताबिक़ दोनों देशों ने जीते हुए इलाक़े मोड़ कर अपनी, पहली वाली  जगहों पर फिर आ जाना था । इस समझौते के दौरान भारत ने अपना वज़ीर-ए-आज़म खो दिया  और जिस की मौत आज तक एक भेद बनी हुई है और दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के आम लोगों ने इस सुलहनामे को अय्यूब ख़ान का बिक  जाना समझा। दोनों मुल्कों में इस जंग के दौरान लोगों के दिलों में एक दूसरे के ख़िलाफ़ नफ़रत और बेएतिबारी कूट कूट  कर भरी हुई थी। इस सुलहनामे की वजह से लोग अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़ हो गए थे । 67 – 68 मैं पाकिस्तान में आम लोगों के साथ स्टूडेंट्स भी अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़ हो गए। हर रोज़ इस के ख़िलाफ़ एहतिजाज , धरने और मुज़ाहिरे होते। इस तरह के हालात में आसिफ़ जी ने देश की ( सियासत) राजनीति में अपना पहला क़दम रखा। ये सारे एहतिजाज , धरने और मुज़ाहिरे बाएं बाज़ू के लोग कर रहे थे। इस में बाद में अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़  दाएं बाज़ू के दाहिने समरथकी लोग भी आकर शामिल हो गए ।
आसिफ़ जी उस वक़्त  पर एम. ए. ओ. कॉलिज में पढ़ते थे। वोह  बताते हैं कि बाएं बाज़ू के लोकों  का यह  ग्रुप बाद में दो ग्रुपों में बंट गया – एक रूस का हामी ( समरथकी ) और दूसरा चीन का हामी (समरथकी ) और आसिफ़ जी ने अपने आप को रूस के हामी ( समरथकी) धड़े में खड़ा पाया। आसिफ़ जी रूस की हामी विदियार्थियों की   आर्गेनाईज़ेशन पंजाब स्टूडेंट्स यूनीयन के मैंबर तो पहले ही थे बाद में वह  पूरे पंजाब के जनरल सैक्टरी भी बन गए । रूस दोस्त  धड़ा अलग अलग क़ौमों के हक़ों की बात करता था लेकिन परन्तु  चीन दोस्त चीन समरथकी धड़ा भारत से सख़्त नफ़रत करता था। और उन की यह  पालिसी आसिफ़ जी को बिलकुल भी मंज़ूर नहीं थी ।
वह  कहते हैं : हिंदुस्तान नक़्शे पर खींची कुछ लकीरों का नाम नहीं है बल्कि यहां इंसान ( मनुष्य) बस्ते हैं बिलकुल हमारे जैसे इंसान  और यह  कोई पराया देश नहीं है  बल्कि मेरा ही देश है ॼ
यह  वाहगे के पार इन का ही वतन था – इधर उन के ही भाई थे – यह  लोग वही बोली बोलते थे जो वोह  बोलते थे, वही कद्रें क़ीमतें और पता नहीं किस किस की रगों में वही ख़ून बहता था जो ख़ून उन को अपनों बुज़ुर्गों पुरुषों से मिला था। इस वाहगे पार धरती के साथ उन को बेहद प्यार था । इस तरफ़ को वोह  अपने आप से अलग सोच ही नहीं सकते। और उन की सोच के मुताबिक़ पंजाबी सिर्फ़ पंजाबी है और कुछ नहीं। चीन नवाज़ समरथकी सोच के वोह  सख़्त ख़िलाफ़ थे। और बाद में भारतीय पंजाब में आना – यहां के लोगों को मिलना उन के बारे में सोचना  उन का ज़िंदगी भर का मिशन बन गया।
इन को इस बात की कोई परवाह नहीं कि वोह  इस मिशन में अकेले हैं या कोई उन के साथ है? बस उन्हों ने अपनी सोच मुताबिक़ जीने और इस बारे लिखने की ठान ली – जिस का नाम है सांझा पंजाब।
आसिफ़ जी के ग्रुप में अलग अलग सूबों में अलग अलग क़ौमों के भी धड़े थे – और एक और बड़ी प स्टूडैंट आरगानॉवज़शन क़ौमी सतह पर भी थी जिस को पाकिस्तान फैडरल यूनीयन आफ़ स्टूडेंट्स कहते थे और आसिफ़ जी उस की मर्कज़ी केंद्रीय कमेटी के भी मैंबर थे।
65 की लड़ाई से कुछ महीनों बाद मुनीर अहमद ख़ान नाम का एक न्यूक्लीयर इंजीनियर भुट्टो को मिला और इस ने भुट्टो को भारत के तेज़ी के साथ बढ़ रहे न्यूक्लीयर प्रोग्राम से रोशनास करवाया। भुट्टो ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस से पाकिस्तान को ख़तरा है। उस ने  ने अय्यूब ख़ान और मुनीर अहमद ख़ान की लंदन में मुलाक़ात करवाई ; लेकिन  इस बात का अय्यूब ख़ान पर कोई असर ना हुआ और उस  ने मुनीर का मश्वरा मानने से इनकार कर दिया। जब अय्यूब ख़ान ने यह  बात ना मानी तो बाद में इस की बात का मीडीया में मज़ाक़ उड़ाया गया , ” हमें ऐटम बम की कोई ज़रूरत नहीं, अगर ज़रूरत पड़ी तो हम ख़रीद लेंगे।
अय्यूब ख़ान के इस इनकार पर भुट्टो ने न्यूक्लीयर प्रोग्राम के लिए एक लॉबी बनानी शुरू कर दी। 1966 मैं अय्यूब ख़ान ने भुट्टो को सरकारी ओहदे से हटा दिया। नाख़ुश भुट्टो ने 1967 में पाकिस्तान पीपल्ज़ पार्टी बनाई और पाकिस्तान में अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़  एक मुहिम शुरू कर दी। इस लगातार शोर-ओ-गुल और सयासी राजनीतिक दबा से तंग आकर अय्यूब ख़ान ने 1969 में देश की बागडोर अपने एक जूनीयर अफ़्सर यहीया ख़ान को दी जो कि इस वक़्त  फ़ौज का कमांडर इन चीफ़ था । यहीया ने जब कुर्सी सँभाली तो ख़ुद को दोनों सूबों का चीफ़ मारशील ला एडमनीसटरीटर मुक़र्रर  कर लिया। उस  ने लोगों के साथ वाअदा किया कि दो सालों के अंदर अंदर वोह  मुल्क में इलैक्शन करवाए गा।
1970 मैं इलैक्शन करवाए गए । आज़ादी के बाद देश के ये पहले असली इलैक्शन थे। बड़ी सतह पर  सतर तैय्यारी की गई। इस में कोई शक नहीं किया ये इलैक्शन बेहद ईमानदारी और साफ़ सुथरे तरीक़े से करवाए गए , आसिफ़ जी  बताते हैं कि ये इलैक्शन ( मतदान ) बिलकुल ही ग़ैर जानिबदार थे ; परन्तु  इस का नतीजा जो सामने आया इस लिए ना ही पाकिस्तान की फ़ौज , पाकिस्तान के लोग और ना ही भुट्टो तैय्यार था । इस नतीजे के बारे में किसी ने ख़ाब में भी नहीं सोचा था । ये नतीजा भुट्टो और पच्छिमी पाकिस्तान को मंज़ूर नहीं था ; इन नतीजों ने देश की  राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। शेख़ मुजीबर  की पार्टी अवामी लीग पार्टी को भारी जीत हुई। लेकिन  यह  जीत उसे सिर्फ मशरिक़ी पाकिस्तान में ही हुई । अब भुट्टो का कहना था कि चूँकि शेख़ मुजीबर  को पंजाब और सिंध में कोई सीट नहीं मिली इस लिए वह  देश में हुकूमत बनाने का हक़ नहीं रखता। आसिफ़ जी याद करते हैं भुट्टो को पंजाब और सिंध में जीत हासिल हुई लेकिन  बलोचिस्तान और सरहद में नैशनल अवामी पार्टी ने ज़्यादा सीटें हासिल की। इस पार्टी बारे आसिफ़ जी बताते हैं कि यह पार्टी काश पावर में रहती, उन की सोच रूस दोस्त समरथकी थी और ये पार्टी भारत के साथ दोस्ती रखना चाहते थी ; इस पार्टी का लीडर वली ख़ान ग़फ़्फ़ार ख़ान का बेटा था ग़फ़्फ़ार ख़ान को फ्रंटियर का गांधी भी कहते थे। मुझे याद आया कि हम अक्सर उस  बारे अख़बारों में पढ़ते होते थे, उस की भारत में हमेशा बहुत इज़्ज़त की जाती थी और इस की अपने इलाक़े में भी बहुत इज़्ज़त थी।
भुट्टो ने मुजीबर  के साथ मुलाक़ात की और ये समझौता किया कि वो ख़ुद सदर बनेगा और शेख़ मुजीब-ओ-ज़ेर आज़म। इस मुलाक़ात के बारे यही ही बिलकुल इलम नहीं था अब दोनों ने यहीया ख़ान पर दबाव डालना शुरू किया कि वो उन को हुकूमत बनाने के लिए दावत दे। इस पर यहीया ख़ान ने भुट्टो को इस के घर क़ैद कर के आस आस पास पहरा बिठा दिया कि वोह  कहीं जा ना सके और किसी को मिल ना सके । यहीया ख़ान ने मुजीबर  को गिरफ़्तार कर लिया। इस बात का आसिफ़ जी पर बहुत असर हुआ ; “

 ” ये तो सरासर ना इंसाफ़ी थी । वोह  कहते हैं कि  वो दुखी हुए कि बंगाली को उन  का जायज़ हक़ क्यों नहीं दिया जा रहा?
इस्लाम के नाम पर बना हुआ मुलक क़ुरआन की ही नसीहत भूल गया। Sura – An – Nisa: 58 ( 4: 58) इंसाफ़ की बात करता है कि अल्लाह सब को देखता है और वह  सब की सुनता है। बड़े जज़बाती हो आसिफ़ जी कहते हैं, ” गुलू  अगर वह  इलैक्शन जीते थे तो, उन का हक़ बनता था कि वह  सरकार बनाते । “
मैं 1950 से लेकर 1970 के आदाद-ओ-शुमार तलाश करती हूँ तो अगरचे मशरिक़ी पाकिस्तान की आबादी मग़रिबी पाकिस्तान की आबादी से कहीं ज़्यादा थी लेकिन  पैसे और सारा कंट्रोल  पच्छिम पाकिस्तान के हाथ में था। मैं पुराने सालों का बजट देखती हैं जहां मग़रिबी ( पच्छिमी ) पाकिस्तान पर 113, 540करोड़ रुपया ख़र्च किया गया, वहां ज़्यादा अधिक आबादी वाले पूर्वी हिस्से पर सिर्फ 45,930 करोड़ रुपया ख़र्च हुआ जो सरासर ना इंसाफ़ी है। इस के इलावा बंगाली सिर्फ 5 % ऊंची सीटों पर थे, बाक़ी सब  पच्छिमी पाकिस्तान के पास थी ज़ाहिर है कि वो पूर्वी हिस्से को सिर्फ अपनी कॉलोनी ही समझते थे।
ज़िंदगी में हम या दूसरे लोग बहादुरी, दिलेरी, और इंसाफ़ के जो फ़ैसले करते हैं – वह  फ़ैसले चाहे कितने ही छोटे और मामूली क्यों ना हों  ; इन फ़ैसलों पर इंसानी तारीख़ बनती है और इस तरह ही मानवीय इतिहास बनता है। किसी एक जगह और अगर कोई ना इंसाफ़ी करता है तो इस का मतलब है कि इंसाफ़ का गला हर जगह घूँट दिया गया है। किसी ना इंसाफी  को देख कर चुप रहने का मतलब है कि  आप तशद्दुद करने वाले का साथ दे रहे हैं । जब आप अकेले ही ना इंसाफ़ी के ख़िलाफ़  खड़े  हो जाते हैं तो ये कभी ना सोचो कि आप अकेले क्या कर सकते हैं ? एक अकेला आदमी जब ना इंसाफी और ज़ुलम के ख़िलाफ़ खड़ा होता है तो यह  ऐसे ही है जैसे कोई एक किरण घोर  अंधेरे को चीर कर गुज़र गई हो ; एक मामूली से मामूली किरण फैले हुए अंधेरे को मात कर सकती है । आप चाहे कुछ भी हूँ, यक़ीन रखो ना उम्मीदी के समुंद्र में आप उम्मीद की एक ज़िंदा और छलकदी लहर होकर इस से निपट सकते हैं । अगर आप जबर के ख़िलाफ़  नहीं बोलते तो इस का मतलब है कि आप इस का साथ दे रहे हैं । आजकल का ज़माना दहश्त गर्दी का ज़माना है। दहश्तगर्दी शायद इतनी ख़तरनाक नहीं ; जितनी ख़तरनाक यह  बात है कि दहश्तगर्दी करने वाला दूसरी सोच पक्ष को किसी भी हालत में बर्दाश्त करना नहीं चाहता ; ख़तरनाक यह  नहीं कि इस का मक़सद  ख़तरनाक है – ख़तरनाक यह  बात है कि वह  बातें जो दूसरों बारे कहता और सोचता है,वो ख़तरनाक हैं। कहीं शायद राबर्ट कैनेडी ने ये बात कही थी।
” क्योंकि बंगालीयों को, एक जीती हुई पार्टी को उन के हक़ नहीं दिए जा रहे थे – वो बेचैन हो रहे थे, तशद्दुद पर उतर आए थे – दूसरा पाकिस्तान में ख़ासकर पंजाब में बंगालीयों के ख़िलाफ़  ज़ोर शोर के साथ प्रोपेगंडा किया जा रहा था कि बंगाली ग़द्दार ; काफ़िर और हिन्दू का एजेंट था “, आसिफ़ जी बातों का सिलसिला शुरू कर देते हैं, ” ये सरासर ग़लत था – मेरी माँ बहुत ही समझदार औरत थी और इस की सब से शानदार बात यह  थी कि वह  बेहद इंसाफ़ पसंद औरत थी ; वह  ना इंसाफी  किसी भी क़ीमत पर बर्दाश्त नहीं करती थी। और ये इंसाफ़ की जन्म घुट्टी मुझे अपनी माँ से भी मिली है – हर क़ीमत पर ना इंसाफ़ी को ग़लत कहना – अगर मैं तक़सीम ( बांट ) के ख़िलाफ़  बोलता हूँ तो इस लिए कि तक़सीम तो भारत की होनी थी , लेकिन  तक़सीम  तो मेरे पंजाब की हुई है – मेरे पंजाबी को यह  क़ीमत क्यों अदा करनी पड़ी ? 47 के वक़्त  पंजाब की पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी थी जिस के हिन्दू, सिख  और मुस्लमान मैंबर थे, उन्हों ने एक बार भी पंजाब को बांटने की बात नहीं की थी , यह  बात तो मुस्लिम लीग ने की जो यू. पी. में बनी । ये इंसाफ़ की ही ख़ाहिश  है कि मैं आज पंजाब के हिन्दू, मुस्लमान और सिखों  को उन के जायज़ हक़ दिलवाना चाहता हूँ “, इस तरह कहते हुए आसिफ़ जी अक्सर उदास हो जाते हैं।
वह  कई कई घंटों के वक़फ़े से वह  मेरे साथ बात करते हैं, वो  वयस़्त होते हैं, बहुत उदास भी लेकिन  फिर भी वक़्त  निकाल मेरे साथ बात करते हैं ” इलैक्शन के नतीजों को कोई भी मानने को तैय्यार नहीं था पाकिस्तान में खासतौर पर  पंजाब में बंगालीयों के ख़िलाफ़  एक मुहिम शुरू हो गई,ये नफ़रत का नाटक मार्च से शुरू हुआ और दिसंबर तक जारी रहा। भुट्टो ने बंगालीयों के ख़िलाफ़  नफ़रत का   झंडा बुलंद रखा और वो बंगाली दुश्मन फ़ौज का साथी रहा। जब मार्च में फ़ौज ने अपना ऑप्रेशन शुरू किया, सब से पहले ये ज़ुलम  पूर्वी पाकिस्तान के  हिन्दूओं के साथ  हुआ,  पूर्वी बंगाल से भागने वाले मुहाजिरों में 60 /हिन्दू थे, फिर मुस्लमान भी भागना शुरू हो गए। पाकिस्तानी फ़ौज ने बाक़ाइदा एक लिस्ट बनाई, प्रोफ़ैसरों, वकीलों , अदीबों , तमाम दानिश्वरों की और फिर उन को चुन चुन के मारना शुरू कर दिया। ये काम इबतिदा में ही शुरू हो गया लेकिन  जंग की आख़िर में ज़्यादा ज़ोर शोर के साथ हो गया। दूसरी जंग-ए-अज़ीम में इस्तिमाल किए गए हिटलर के तरीक़े अपनाए गए। मारे गए दानिश्वरों की तादाद संख्या 1000 से भी  अधिक है। अलग – अलग एजैंसीयां के अनुसार  मरने वालों की तादाद  200,000 से लेकर 3,000,000 तक बताई जाती है, बेशुमार (असंख्य ) औरतों की इज़्ज़त लुटी  गई,बंगालीयों के घर लुट  लिए गए। आसिफ़ जी बताते हैं कि पाकिस्तानी फ़ौजी  पूर्वी पाकिस्तान से बक्सों के बक्से भर भर कर सोना, पैसा करंसी के रूप में ला रहे थे। मुझे याद है कि एक फ़ौजी जनरल ने कहा थी कि वह  जाने से पहले बंगाल में एक बास्टर्डज़ की पूरी आबादी छोड़कर जाएंगे – 8 करोड़ से लेकर 10करोड़ तक मुहाजिर भाग कर भारत आए। एक बार मेरे बंगाल के बारे लिखे कालम पर किसी   ने इतराज़  किया था ; इस बारे में कोई दूसरी राय नहीं है कि कुछ भारती फ़ौजीयों ने भी लूट मार मचाई होगी। मुझे याद है कि बाद में कुछ भारतीयों पर मुक़द्दमे भी चले थे । लेकिन  इस का मतलब यह  नहीं कि जो पाकिस्तानीयों ने किया  वो कम था या उस को माफ़ किया जा सकता है। ऑप्रेशन के पहले दिन ही फ़ौजीयों ने ढाका यूनीवर्सिटी की कई लड़कीयां को ज़बरदस्ती उठा लिया और उन को जंग के आख़िर तक रखैलों की तरह रखा गया और जंग ख़तम  होने तक इन सभी के बच्चे हो चुके थे। इन के ज़ुल्मों की लिस्ट बहुत लंबी है।

आसिफ़ जी बताते हैं कि इन से यह  ज़ुलम, ये ना इंसाफ़ी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। इस वक़्त पंजाब में रह कर बंगाल के हक़ में कुछ भी कहना और सोचना  खुदकशी ( आत्म हत्या) करने के बराबर था। लेकिन  जब आपके दिल में इंसाफ़ की लो जल रही हो तो आप किसी बात की भी परवाह नहीं करते। आसिफ़ जी की स्टूडैंट आर्गेनाइज़ेशन ने एक प्रोटेस्ट दिन मनाने का सोचा, और उन्हों ने प्रोटेस्ट के तौर पर बंगला देश के हक़ में इश्तिहार बांटे और मुज़ाहरा किया। फ़ौजी अफ़िसरों ने इस पर उस स्टूडैंट आर्गेनाइज़ेशन के सब लीडरों को गिरफ़्तार कर लिया, सभी नेता पकड़  लिए। वो इस गिरफ़्तारी को याद करते हुए बताते हैं कि पहले तो उन को थाने लिजाया गया, वहां उन को बहुत ही ज़लील किया गया, हर मुम्किन तरीक़े से उन की बेइज़्ज़ती की गई। बुरी तरह पीटा गया। फिर उन को जेल में ले जा कर पागलों की बैरक में बंद कर दिया गया, पागलों की ये बैरक जेल में अलग थी। फिर उन को बदल कर इस जगह डाल दिया गया जहां ख़तरनाक क़ैदी थे, जिन में से बहुत से क़ातिल, और जासूस थे। इस पर भी जेल वालों को तसल्ली नहीं हुई उन को अकेले या सोलीटरी सेल में डाल दिया। आसिफ़ जी ने जब इस बात पर एतराज़ किया कि इन के साथ इस तरह का  वयवहार क्यों किया जा रहा है,  और उन्हों ने  उस की ये वजह बताई गई कि, ” वो ख़तरनाक क़ैदी हैं, देश के लिए ख़तरा है ; क्योंकि वो ग़द्दार हैं, जेल वालों को डर है कि बाक़ी क़ैदी ग़ुस्से में भड़क कर उन को मार ना दें , सो उन कीहिफ़ाज़त के लिए उन को यहां अकेले रखा गया है। ” क्या जुर्म था इन का? सिर्फ इंसाफ़ की ही तो उन्हों ने बात की था। वो बताते हैं कि हर वक़त  पर उन को यहां बेइज़्ज़त किया जाता। एक ही कमरा था जिस में लेटने के लिए पूरी जगह भी नहीं थी ; एक बेहदगंदा बदबूदार कम्बल, जिस में खटमल ही खटमल थे, उन को दिया गया। इसी जगह और वो टट्टी पेशाब करते, सारा दिन वो जगह  दुर्गंध के साथ भरी रहती। इसी  दुर्गंध में वो खाना खाते। इन दिनों का उन के मन पर आज तक असर भाव है, कई सालों बाद भी वो यूरोप में इस को महसूस करते रहे हैं ;सायकालोजस्ट से ईलाज  करवाते रहे। आज तक इस जेल की याद उन को उदास कर जाती है। इन को जो बात आज  तक भूली  नहीं कि किस तरह उन को वहां ज़लील किया गया। इन दिनों को याद करते वो बताते हैं कि इस वक़्त  पर इस जेल में अहमद सलीम भी उन के साथ था और कुछ दिन उन्हों इसी जेल में हबीब जालिब के साथ भी गुज़ारे। 1971 की लड़ाई के नतीजे के बारे हम सब जानते हैं। जंग ख़तम  हुई तो यहीया ख़ान को गद्दी से उतार दिया गया। गुल  हसन नाम के फ़ौजी जनरल ने हुकूमत की बागडोर सँभाली । इस ने सब पुराने अफ़िसरों को निकाल दिया । गुल हसन फ़ौजी जनरल था लेकिन  इस ने सारी बागडोर हाथों में सँभालने की जगह भुट्टो को चीफ़ मार्शल ला एडमनीसटरीटर बना दिया। नई बनी सरकार ने तमाम सभी  राजनीतिक क़ैदीयों को रिहा करने का फ़ैसला किया। आज हम जिस आसिफ़ शाहकार को जानते हैं ; इस की तस्वीर इस तरह है कि वो एक पक्के पंजाबी हैं ;पंजाबी क़ौम में वो यकींन  रखते हैं। वो यह  सपना देखते हैं कि हम, हिन्दू, सिख , और मुस्लमान बाद में हैं लेकिन पहले हम पंजाबी हैं और सिर्फ पंजाबी ! इस पर मैं अक्सर इस तरह सोचती हूँ कि यह  एक ख़ाब है दीवाने का ! और हम उन को इस तरह जानते हैं कि वो मादरी ज़बान  (मातृभाषा) को बेहद प्यार करते हैं, आजकल पंजाबी ज़बान और पंजाबी आदमी  के साथ जो बरताओ हो रहा इस पर इन का दिल ज़ार ज़ार रोता है। जिस दिन पाकिस्तान में पंजाब को बांटने का फ़ैसला हुआ, मेरी उन के साथ बात हुई, अ॒न की इस उदासी को ब्यान करना मुश्किल है। सिख क़ौम को वो पागलों की तरह प्यार करते हैं ; इस वजह से वह  अपने आप को आधा महसूस करते हैं ; और उन का दिल पंजाबी हिन्दू के लिए भी बेहद तड़पता है ,  वो कहते हैं कि असल में तो पंजाब का वह  ही असली वारिस है। लेकिन  सच्च तो ये है कि वो ये सारा कुछ इस लिए कर सके क्योंकि उन की बुनियादी ख़ाहिश इंसाफ़ है
अगर वो लेफ्ट धड़े में जुड़े तो भी वो इंसाफ़ करके है । इन का सारा फ़लसफ़ा , तमाम तहरीरें , सारी नज़मों का पहला मर्कज़ इंसाफ़ की ही ख़ाहिश और सपना है ; वो शुक्रगुज़ार हैं कि ये जन्म घुट्टी उन को अपनी माँ से मिली ! और ख़ुदा  ने भी इन को स्वीडन में इंसाफ़ करने की कुर्सी पर ही बिठा दिया।
ये में सारा मज़मून लिख कर पढ़ती हूँ । मुझे इलम है कि इन के बारे में करनेवाली बहुत सी बातें रह गई हैं। सोचती हूँ मेरी उन के साथ अगर दोस्ती हो गई थी और ये दोस्ती इतनी पक्की क्यों हो गई ? शायद कहीं मेरा कुछ उन के साथ मिलता है। मैं अक्सर बचपन में सोचा करती थी कि यह  सारी दुनिया मेरी है ; कोई अफ्रीकन, कोई गोरा, पीला मुझे पराया नहीं लगता था ; फिर मैं क॒छ बंद हो गई, थोड़ी सी तंगदिल हो गई, मुस्लमान मुझे तंगदिलऔर माज़ी परस्त लगते ! इस्लाम मुझे अमन के लिए ख़तरा लगता ; वैसे तो मेरी दोस्त हैरी अटवाल अक्सर मेरी सोच को सीधी सिम्त देती रही है लेकिन  आसिफ़ जी ने मुझे फिर सोचने का ढंग सिखाया । वो आफ़ाक़ी हैं , दुनिया को एक ग्लोबल गांव समझते हैं, देशों की हदें उन के लिए क़ैद हैं, जेल हैं। क्यों नहीं हम जहां जाना चाहते वहां जा सकें। रब  ने हमें इंसानों  की तरह इस धरती पर भेजा , हमारे जिस्म  पर तो वो कोई निशान नहीं लगाता कि हमें हिन्दू, सिख , मुस्लिम, या ईसाई होना चाहीए। देशों की हदों और कांटों वाली बाड़ों से उन का दम घटता हैं। इस धरती पर सब का एक जैसा हक़ है। वो दुनिया में इत्तिहाद और इत्तिफ़ाक़ पर यक़ीन रखते हैं। बंगालीयों के लिए उस वक़्त उन्हों ने प्रोटेस्ट किया जिस वक़्त  पर इस तरह की बात करना मौत को दावत देना था, जिस तरह के  राजनीतिक हालात पाकिस्तान में रहे हैं, उन के साथ मज़ीद भी बुरा हो सकता था। वो जंग के सख़्त ख़िलाफ़ हैं, किसी को मारना क़तल है चाहे वो जंग के मैदान में ही हो या कहीं और हो ;जंग के मैदान में दुश्मन का सिपाही नहीं मरता बल्कि एक क़तल होता है  बिलकुल जैसे कोई और इंसान मनुष्य क़तल होता है  उसे मारने वाला कोई हीरो नहीं है  बल्कि क़ातिल है  बिलकुल जैसे क़ानून, धर्म और अख़लाक़ीयात की नज़र में कोई और क़ातिल  लेकिन  हम इस क़तल को जायज़ क़रार दे के कर क़ातिल को बरी कर देते हैं। यह  कैसा क़ानून, धर्म और अख़लाक़ाअत है जो जंग के ज़रीये क़ातिलों को हीरो,मुजाहिद, वतन परस्त देश भक्त और ना जाने और क्या क्या कहते हैं और जंग में क़तल हुए को हम शहीद या दुश्मन के मारे गए सिपाही कहते हैं। कितने मुनाफ़िक़ हैं हम। हम ख़ाक तहज़ीब याफ़ता  (सीवलाईज़ड) हैं हम ने  ख़ाक  तरक़्क़ी की है  हम आज भी पत्थर के ज़माने की तरह जंगें कर रहे हैं। ; इस तरह वो सोचते हैं। जो जंग का फ़ैसला करते हैं, वो ख़ुद मैदान में नहीं आते , लड़ते तो कोई और हैं, जिन को बहुत दफ़ा इस बात की भी समझ नहीं होती कि इस के कंधे पर बंदूक़ क्यों है ! या किस ने इस के कंधे पर बंदूक़ रखी। सियासतदानों ( राजनीतगीयों ) की ये मक्कारी वह  ख़ूब समझते हैं
। अब आप इस तरह के इंसान (मनुष्य)  के साथ इशक़ नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे । मेरी दुआ है कि रब  उन को लंबी उम्र दे, पंजाबी और पंजाबीयों की ख़िदमत सेवा के लिए उन की क़लम चलती रहे और वो छोटों और नौजवानों को सीधा रास्ता दिखाते रहें 
नोट: पिछले दिनों में हमारे बे  एरिया में हमारी वपसा ने बहुत कामयाब और ख़ूबसूरत फंक्शन क्या ; एक महफ़िल में सुखविंदर अमृत ने सुरजीत पात्र जी की शान में एक नज़म पढ़ी और इस से पहले वो उन को मेरे गुरु, मेरे मुर्शिद ” कह कर मुख़ातब हुए , इस का ये लहजा और ये लफ़्ज़ मेरे अंदर तक उतर गए। सो वही लफ़्ज़ मैंने इस कालम के उनवान को दिए हैं।!

 

Hi, Stranger! Leave Your Comment...

Name (required)
Email (required)
Website
 
UA-19527671-1 http://www.sanjhapunjab.net